धनपुरी में 35 फीट की लकीर पर बड़ा सवाल: विकास के नाम पर आशियाने उजड़ेंगे या पहले होगी सुनवाई?

 

नगर पालिका के नोटिस से मचा हड़कंप, एक दिन पहले सर्वदलीय मोर्चे का विरोध; नागरिक पूछ रहे—पट्टा और दस्तावेज हैं तो पहले उनकी जांच क्यों नहीं?


जमीलुर्रहमान मध्यप्रदेश।

धनपुरी नगर में मुख्य सड़क के दोनों ओर 35-35 फीट की सीमा को लेकर शुरू हुआ विवाद अब केवल अतिक्रमण हटाने तक सीमित नहीं रह गया है। यह मामला अब कानूनी प्रक्रिया, वर्षों से बसे परिवारों के दस्तावेज, रोजगार, पुनर्वास और नगर के भविष्य से जुड़े बड़े सवाल खड़े कर रहा है।

नगर पालिका परिषद धनपुरी द्वारा जारी नोटिस में सार्वजनिक सड़क के विस्तार और आवागमन में सुविधा का हवाला देते हुए संबंधित निर्माणों को लेकर कार्रवाई की चेतावनी दी गई है। नोटिस में मध्यप्रदेश नगरपालिका अधिनियम, 1961 की धाराओं 183 और 187 का उल्लेख किया गया है।

नोटिस सामने आने और मुख्य सड़क के दोनों ओर 35-35 फीट के निशान लगाए जाने के बाद प्रभावित नागरिकों में चिंता बढ़ गई। इसी के विरोध में एक दिन पहले सर्वदलीय संयुक्त मोर्चे के नेतृत्व में बड़ी संख्या में नागरिकों और व्यापारियों ने नगर पालिका पहुंचकर विरोध प्रदर्शन किया था।

35 फीट की सीमा आखिर किस आधार पर?

नगर पालिका के नोटिस में बताया गया है कि अमरकंटक रोड से नगर पालिका कार्यालय के सामने से आजाद चौक होते हुए बगईया पुल तक सड़क संकरी होने के कारण आवागमन प्रभावित होता है और नगर का व्यवसाय भी प्रभावित हो रहा है। इसी आधार पर सड़क के दोनों ओर 35-35 फीट की सीमा में निर्माण हटाने/पीछे करने की प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है।

लेकिन धनपुरी के नागरिकों का मूल सवाल है—

क्या 35-35 फीट की सीमा पहले से विधिवत निर्धारित 'रेगुलर लाइन ऑफ पब्लिक स्ट्रीट' है?

यदि यह नई सड़क सीमा अथवा रेगुलर लाइन निर्धारित करने की प्रक्रिया है तो इसकी वैधानिक स्वीकृति, पुराना रिकॉर्ड, नक्शा, सीमांकन और आपत्तियों की प्रक्रिया सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही?

मध्यप्रदेश नगरपालिका अधिनियम की धारा 183 में सार्वजनिक सड़क की नियमित लाइन निर्धारित करने के लिए कम से कम एक महीने की सूचना और प्राप्त आपत्तियों पर विचार करने का प्रावधान है तथा राज्य सरकार की पूर्व स्वीकृति का उल्लेख भी है। ऐसे में नगरवासियों का यह जानना स्वाभाविक है कि धनपुरी में 35 फीट की सीमा तय करने का आधार क्या है और उससे संबंधित पूरा रिकॉर्ड क्या कहता है।

नोटिस में 7 दिन और फिर 3 दिन—यह अंतर क्यों?

नोटिस की भाषा पर भी नागरिक सवाल उठा रहे हैं।

नोटिस में पहले कहा गया है कि नोटिस प्राप्ति के 7 दिवस के भीतर निर्माण से संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत किए जाएं। लेकिन आगे फिर से कहा गया है कि नोटिस प्राप्त होने के 3 दिवस के भीतर भू-स्वत्व संबंधी दस्तावेज प्रस्तुत किए जाएं, अन्यथा अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई प्रस्तावित की जाएगी।

ऐसे में सवाल उठता है—

प्रभावित नागरिकों को दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए वास्तविक समय सीमा 7 दिन है या 3 दिन?

और यदि किसी परिवार के पास पट्टा, रजिस्ट्री, भवन संबंधी दस्तावेज, बिजली बिल, समग्र आईडी अथवा वर्षों पुराने रिकॉर्ड हैं, तो क्या उन्हें व्यवस्थित रूप से जांचने और उनका पक्ष सुनने का पर्याप्त अवसर दिया जाएगा?

सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन क्या कहती है?

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने In Re: Directions in the Matter of Demolition of Structures मामले में 13 नवंबर 2024 को विध्वंस संबंधी कार्रवाई के लिए विस्तृत प्रक्रिया निर्धारित की थी, जिसे बाद में 2025 में रिपोर्ट किया गया।

सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के अनुसार सामान्य मामलों में बिना पूर्व शो-कॉज नोटिस के विध्वंस नहीं किया जाना चाहिए। नोटिस के लिए स्थानीय कानून में निर्धारित अवधि या नोटिस प्राप्त होने से 15 दिन, जो अधिक हो, उसका प्रावधान किया गया है। नोटिस में कथित अनधिकृत निर्माण की प्रकृति, उल्लंघन का आधार, आवश्यक दस्तावेज और व्यक्तिगत सुनवाई की तारीख/प्राधिकारी का उल्लेख होना चाहिए। इसके बाद संबंधित व्यक्ति को व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर दिया जाना है और अंतिम आदेश कारणों सहित पारित किया जाना है।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि ये दिशानिर्देश सार्वजनिक स्थान जैसे सड़क, स्ट्रीट, फुटपाथ या नदी/जल निकाय पर मौजूद अनधिकृत निर्माणों पर उसी रूप में लागू नहीं होते। इसलिए धनपुरी में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यही होगा कि नगर पालिका जिन निर्माणों को हटाने की बात कर रही है, उनकी कानूनी स्थिति वास्तव में क्या है।

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने 2026 में भी प्रक्रिया पर दिया जोर

यह केवल सुप्रीम कोर्ट की पुरानी गाइडलाइन का सवाल नहीं है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने 3 जुलाई 2026 के Ashiq Shah बनाम State of Madhya Pradesh मामले में सुप्रीम कोर्ट की इन्हीं दिशानिर्देशों का उल्लेख करते हुए कहा कि संबंधित व्यक्ति को जवाब और दस्तावेज प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाए तथा उसके बाद सुनवाई करके निर्णय लिया जाए।

उस मामले में हाईकोर्ट ने संबंधित व्यक्ति को जवाब देने का अवसर दिया और अधिकारियों को निर्णय लेने तक कोई coercive demolition action नहीं करने का निर्देश दिया। प्रतिकूल आदेश होने पर कानूनी उपाय के लिए भी समय दिए जाने की बात कही गई।

इसी तरह 18 जून 2026 को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने Mahendra Kumar Navaiya मामले में भी अधिकारियों को संबंधित व्यक्ति के जवाब और दस्तावेजों पर विचार कर, व्यक्तिगत अवसर देते हुए सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के अनुसार ही आगे की कार्रवाई करने को कहा। निर्णय होने तक coercive action नहीं करने का निर्देश भी दर्ज है।

इसलिए धनपुरी में असली सवाल यह है—

क्या यहां भी पहले प्रत्येक निर्माण की अलग-अलग वैधानिक स्थिति जांची जाएगी?

क्या पट्टाधारियों और वर्षों से बसे परिवारों को व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर मिलेगा?

क्या यह स्पष्ट किया जाएगा कि किस हिस्से को अनधिकृत माना गया है और किस कानून/नक्शे/सीमांकन के आधार पर?

क्या 35 फीट की पूरी पट्टी में आने वाले प्रत्येक मकान और दुकान के लिए अलग-अलग आदेश जारी होंगे?

सर्वदलीय विरोध ने बताया—मामला केवल राजनीति का नहीं, रोजी-रोटी का भी है

एक दिन पहले हुए सर्वदलीय संयुक्त मोर्चे के विरोध प्रदर्शन में पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष हंसराज तनवर, व्यापारी संघ अध्यक्ष अजय जायसवाल, पूर्व अध्यक्ष मुबारक मास्टर, नगर कांग्रेस अध्यक्ष अनिल जायसवाल और मोहन कश्यप के नेतृत्व में बड़ी संख्या में लोग नगर पालिका पहुंचे थे।

प्रदर्शनकारियों ने नगर पालिका अध्यक्ष रविन्द्र कौर छाबड़ा, सीएमओ अमित तिवारी और उपाध्यक्ष हनुमान खण्डेलवाल को ज्ञापन सौंपकर कार्रवाई रोकने और नागरिकों की समस्याओं पर विचार करने की मांग की।

इस दौरान शिफ्तैन नियाजी, राजेश सोनी, राकेश सोनी, सीताराम विश्वकर्मा, मथुरा जायसवाल, तिलक राज सोनी, सुनील कुमार सोनी, आशीष सोनी, मोहम्मद सादिक, चंद्रिका सोनी, मोहम्मद नसीम, मोहम्मद शरीफ, बेटू अग्रवाल सहित बड़ी संख्या में नागरिक और व्यापारी मौजूद रहे।

लोगों का कहना था कि वे दशकों से यहां रह रहे हैं। कई परिवारों के पास पट्टे और अन्य दस्तावेज हैं। ऐसे में किसी भी कार्रवाई से पहले उनके दस्तावेजों की जांच और उनकी बात सुनना जरूरी है।

सबसे बड़ा सवाल—धनपुरी के बेरोजगार लोगों का क्या?

इस पूरे विवाद का एक पहलू ऐसा है जिस पर शायद सबसे ज्यादा गंभीरता से विचार करने की जरूरत है—रोजगार।

धनपुरी की पहचान लंबे समय तक भूमिगत कोयला खदानों और उनसे जुड़े रोजगार से रही है। खदानों के बंद होने के बाद नगर में रोजगार के पुराने साधन कमजोर हुए हैं। ऐसे माहौल में छोटे दुकानदार, मजदूर, फुटकर कारोबारी और छोटे व्यवसाय करने वाले परिवार अपने सीमित साधनों से जीवन चला रहे हैं।

ऐसे में यदि सड़क विकास के नाम पर बड़ी संख्या में दुकानें और रोजगार के छोटे केंद्र प्रभावित होते हैं तो सवाल केवल भवन टूटने का नहीं रहेगा।

सवाल यह होगा कि उन परिवारों की आय कहां से आएगी?

क्या नगर पालिका विकास के साथ रोजगार का भी रोडमैप बनाएगी?

नगरवासियों का यह सवाल भी विचारणीय है कि यदि धनपुरी को व्यवस्थित और विकसित किया जा रहा है तो क्या विकास योजना में रोजगार और स्वरोजगार को भी शामिल किया गया है?

क्या नगर में—

  • व्यवस्थित छोटे व्यापारिक क्षेत्र विकसित किए जा सकते हैं?

  • प्रभावित दुकानदारों के लिए वैकल्पिक बाजार की व्यवस्था हो सकती है?

  • छोटे व्यवसाय और स्वरोजगार के लिए स्थान उपलब्ध कराया जा सकता है?

  • बंद खदानों के बाद बेरोजगार हुए लोगों के लिए कौशल एवं रोजगार योजना बनाई जा सकती है?

  • सड़क विकास के साथ स्थानीय व्यापार को बचाने की योजना तैयार की जा सकती है?

धनपुरी के विकास का मतलब केवल चौड़ी सड़क नहीं, बल्कि उस सड़क के किनारे चलने वाली जिंदगी को भी सुरक्षित रखना होना चाहिए।

प्रशासन से जनता के सीधे सवाल

1. 35-35 फीट की सीमा किस नक्शे, सीमांकन या स्वीकृत योजना के आधार पर तय की गई है?

2. क्या इस सीमा को 'रेगुलर लाइन ऑफ पब्लिक स्ट्रीट' के रूप में विधिवत निर्धारित किया गया है?

3. यदि हां, तो संबंधित आदेश, स्वीकृति, नक्शा और आपत्तियों की प्रक्रिया सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही?

4. जिन नागरिकों के पास पट्टा अथवा अन्य भूमि संबंधी दस्तावेज हैं, क्या प्रत्येक मामले की अलग-अलग जांच होगी?

5. नोटिस में 7 दिन और बाद में 3 दिन की अलग-अलग समय सीमा क्यों लिखी गई है?

6. क्या प्रत्येक प्रभावित नागरिक को व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर मिलेगा?

7. क्या नगर पालिका यह बताएगी कि किस निर्माण को किस आधार पर अनधिकृत माना गया है?

8. यदि किसी हिस्से को हटाना आवश्यक पाया जाता है तो क्या कम नुकसान वाले विकल्पों पर भी विचार किया जाएगा?

9. जिन छोटे व्यापारियों की दुकानें प्रभावित होंगी, उनके रोजगार का वैकल्पिक प्रबंध कौन करेगा?

10. खदानें बंद होने के बाद बेरोजगारी झेल रहे धनपुरी के लोगों के लिए नगर प्रशासन की दीर्घकालीन रोजगार योजना क्या है?

विकास भी हो और धनपुरीवासी भी बचें

धनपुरी को विकास चाहिए। सड़कें बेहतर हों, यातायात सुगम हो, बाजार व्यवस्थित हो और नगर आगे बढ़े—यह हर नागरिक की जरूरत है।

लेकिन विकास की प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण बात कानून के साथ न्यायपूर्ण प्रक्रिया और प्रभावित नागरिकों की बात सुनना है।

सुप्रीम कोर्ट और मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के हालिया आदेशों से कम से कम इतना स्पष्ट है कि जहां संबंधित न्यायिक दिशानिर्देश लागू होते हैं, वहां नोटिस, दस्तावेज, सुनवाई, कारणयुक्त आदेश और कानूनी उपाय के अवसर जैसी प्रक्रियाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। साथ ही सार्वजनिक सड़क पर वास्तविक अनधिकृत अतिक्रमण के मामलों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने अलग स्थिति स्पष्ट की है। इसलिए धनपुरी में पहले भूमि की कानूनी स्थिति और 35 फीट सीमा का वास्तविक आधार साफ होना जरूरी है।

आज धनपुरी के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सड़क कितनी चौड़ी होगी?

सवाल यह भी है कि—

सड़क चौड़ी होगी, लेकिन उस सड़क पर चलने वाले धनपुरी के परिवारों की जिंदगी कितनी सुरक्षित रहेगी?

खदानें बंद होने के बाद जिनके पास पहले ही रोजगार का संकट है, उनके हाथ से छोटा-सा कारोबार भी चला गया तो उनकी आय का स्रोत क्या होगा?

नगर का विकास जरूरी है, लेकिन ऐसा विकास ही स्थायी होगा जिसमें सड़क भी बने, व्यवस्था भी सुधरे और धनपुरी के नागरिकों का घर, सम्मान और रोजी-रोटी भी सुरक्षित रहे।

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